Wednesday, June 19, 2019

亚投行的新考验评论通过管理员审核后翻译成中文或英文

缅甸金山水泥厂的办公室位于附近河边的一个小村子里,办公室的墙上钉着一只白色的意见箱。村民若是认为工厂存在问题,如导致水质或空气质量下降,就可以往意见箱里塞纸条进行投诉。但水泥厂工作人员和当地人都不清楚这些投诉将如何解决,或者能否得到解决。

金山水泥厂是亚洲基础设施投资银行(以下简称“亚投行”)自2015年成立以来首批投资的项目之一。2018年12月,亚投行建立了一个新的机制,作为研究人员口中常见的基础意见箱申诉制度的补充。该机制让社区能够直接向银行总部反映他们的问题

被称为“中国的世界银行”的亚投行是一家多边开发银行,目前拥有93个成员国,中国目前仍持有31%的股份,是所有成员国中占股最多的。该行被视为对中国多边领导力的考验,其宗旨是“精简、廉洁、绿色”,即摆脱同类机构中常见的官僚主义,坚持环境和社会高标准。而后一点,中国本国的开发银行都尚未做到。亚投行新的申诉机制是朝着国际最佳实践迈出的一步,但其缺陷也再次引起了外界一直存在的批评:精简、绿色,说起来容易做起来难。

让开发银行承担责任

上世纪80年代末,印度西部拟修建一座160米的大坝。这一提案引发了一场争论:多边银行是否应该对那些受其投资影响的偏远社区负责。世界银行打算投资建设世界上最大的灌溉系统,而这个大坝就是该项目的一部分。外界对该项目的社会和环境影响(包括14万居民被迫搬迁)一片哗然,导致世界银行首次不得不对其投资的项目启动独立审查。审查表明,尽管有保障措施,项目仍可能导致严重损害,尤其是对缺乏强有力的法律制度和民间社会的国家,因此需要更多监督。

这场争论以及其他类似事件推动创建了首个针对多边开发银行的问责制度——现在这个制度得到了广泛采用。这些政策允许民众直接,而不是通过项目建设公司向银行提出投诉。通过建设公司投诉既有风险,又没有用,金山水泥厂就是个例子。

欧洲银行信息中心联合主任凯特·盖瑞认为,尽管银行不是当地活动的直接参与者,但他们的投资让可能造成损害的项目得以开展,这就是申诉机制存在的道义基础。“投资了就应该负责任。”她说。多年来,多边开发银行收到的投诉数量有所增加,表明这些渠道对缺乏其他申诉方法的地方社区而言十分重要。

让亚投行负责

亚投行已经仿照主要开发银行的政策制定了一系列环境和社会政策,其中最重要的就是该行的《环境与社会框架》。该框架要求其遵循同行的做法,建立问责制度。

执行方面,亚投行新的问责政策允许两人及以上人员就银行对该框架的执行不力提出投诉。一旦确认投诉属实,就可以启动合规审查,进而制定管理行动计划,解决已经确定的问题,或者是进入争端解决程序。后者往往是在社区已经遭受土地掠夺等损失,并希望就具体赔偿进行谈判时启用的。

盖瑞说,强有力的问责机制有两个关键职能:为受影响社区提供补救,以及为银行提供改进自身实践的机会,后者与新近成立的亚投行关系尤为密切。其他银行被成功索赔的案例改变了制度实践,造成大量赔款。2004年,有社区就国际金融公司(世界银行集团下的私营部门贷款机构)投资当地棕榈油带来的环境和社会影响提出投诉,导致该公司下令暂停清拆土地,世界银行集团实施了为期18个月的棕榈油融资禁令,同时重新评估项目风险

今年3月下旬,受亚投行项目影响的社区可以开始申诉,届时该行的新政策将接受考验。

亚投行能否做到绿色精简?

批评人士对亚投行先于制定社区问责政策就着手投资一事表示震惊。虽然最后的政策照顾到了他们关切的很多方面,但仍有人对结果持保留态度,尤其是当地社区与银行的沟通渠道方面。包容性发展国际(Inclusive Development International)的法律总监娜塔莉·布加尔斯基说,“亚投行的政策虽然包含了一些创新元素……但在几个重要方面没有达到国际最佳实践。”

她指出了该政策的一个最根本的问题。社区投诉必须以项目未能遵守银行自身的环境和社会框架为基础。布加尔斯基说:“由于这些标准的范围比国际金融公司的绩效标准等国际公认的标准要狭窄很多,也更加模糊,所以社区遭受的严重损害可能不属于该机制的受理范围。”例如,商业和人权资源中心( and     )研究员周龙炜指出,框架要求银行在其项目中“征求”原住民社区的意见,但并没有要求获得他们的“同意”,这一点与其他银行不同。

民间社会组织人士看到的另一个问题是,该机制不适用于亚投行与其他机构联合投资的项目。联合投资项目占亚投行投资组合的65%。亚投行在这些项目上将尊重其他银行的问责机制,但会保持在过程中获悉并关注争端解决过程。但是,其他银行的政策虽然更强有力,但缺少亚投行的某些关键特征。例如,世界银行监察小组就不具备解决争端的职能,无法作为中间人直接参与银行客户和受影响社区之间争端的解决过程。“我们认为,受影响的人应该能自由选择最符合其自身情况、最能促成其想要的结果的机制。”布加尔斯基说。

随着亚投行日趋成熟,越来越多地开始独立投资,这一问题将随着时间的推移而消失。但目前社区成员们不得不依靠其他银行或者当地公司来解决他们的问题。这是亚投行追求的精简与社区利益相违背的一个例子,凯特·盖瑞说

针对该行35%的独立投资项目,社区能够通过银行自身的申诉机制提出申诉。但政策规定,投诉人必须先诉诸银行管理层或当地申诉补救机制,如金山水泥厂的意见箱。

跨国公司研究中心(Centre for Research on Multinational Corporations)高级研究员克里斯托·吉诺维斯说,根据她与社区合作的丰富经验,这些由公司运营的机制从来都是没用的。她说,亚投行在这方面是个特例。“其他银行不会要求你先诉诸项目层面的申诉机制。”

首先在当地提出投诉可能会导致投诉者遭到当地政府或公司的报复。然而,亚投行通过了一项引申条款。该条款认识到了这一风险并指出,投诉者如果面临此类威胁,可直接联系银行,无需先在当地申诉。

亚投行拒绝就新政策发表评论。行长金立群在一篇新闻稿中说:“确保亚投行投资的项目不会对环境和当地民众造成伤害,是我们“精简、廉洁、绿色”价值观的基石。这一机制将会让我们能够对受影响民众的担忧快速做出反应,以便我们能够与客户合作,及时解决这些问题。”

中资银行的榜样?

环境律师、马里兰大学法学院讲师张兢兢认为,尽管外界有批评,但与中国其他一些海外开发实践和机构相比,亚投行及其政策堪称典范。

张兢兢帮助发展中国家的社区通过司法渠道解决与中国开发有关的一些问题。从塞拉利昂到几内亚,她处理过的中资银行投资的项目都没有为当地民众提供投诉渠道。她承认亚投行的申诉机制有其局限性,但也认为该政策为这些机构提供了一个具有启发性的范例。“我希望中资银行能够从中吸取教训,效仿亚投行,建立自己的社会保障框架和申诉机制,”她说。

近来一项分析显示,中国帮助建立的亚投行和新开发银行在环境和社会标准方面的表现都优于中国本国的政策银行。然而,中国国内的政策银行在规模和全球影响力上仍远超亚投行。2016年,亚投行的贷款不足中国对“一带一路”国家总投资的1%。

美国大学副教授塔马尔·古特纳近来警告称,亚投行可能会分散对大型中资银行的注意力:“中国在亚投行以外的行动与该行的政策目标之间存在明显的矛盾和张力,这可能导致亚投行变成一个万绿丛中一点红的‘形象工程’。”

目前而言,亚投行对国际最佳实践的追求将在3月新政策生效时受到考验。吉诺维斯认为,政策语言十分重要,但执行才能真正展示其在问责制方面的努力。如果执行得好,“这将是一项虽不令人惊艳,但却非常有效的政策,”她说。

Monday, May 27, 2019

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सब इंस्पेक्टर अनिल कुमार सिंह की जांच रिपोर्ट के मुताबिक़, जीतराई हांसदा ने अपने फ़ेसबुक पोस्ट में लिखा था, "हम आदिवासी बीफ़ यानी गौमांस खाते हैं. जाहेर डांगरी विधान (अंतिम संस्कार के रिच्युअल्स) के समय इसका वध करते हैं."
"इसके अलावा पर्व-त्योहार में भी काटते हैं. तो क्या भारत के क़ानून की वजह से हम अपना खान-पान, रिच्युअल्स यानी पारंपरिक अनुष्ठान बंद कर दें और हिंदू बनकर रहें. आदिवासियत को ख़त्म कर दें. ये कभी नहीं हो सकता.... अगर सही मायने में आदिवासियों को भारत का हिस्सा मानते हों तो आदिवासियों के भी हितों की रक्षा करते हुए ऐसे क़ानून बनाना बंद करो..."
हालांकि अब यह पोस्ट जीतराई हांसदा के फ़ेसबुक पेज पर नहीं दिखती. उनकी पत्नी माही सोरेन ने बताया कि संभव है कि उन्होंने यह पोस्ट बाद में हटा ली हो.
माही सोरेन ने बीबीसी से कहा, "हम लोग समझ रहे थे कि अब यह मामला बंद हो चुका है, लेकिन उन्हें तब गिरफ्तार कर लिया, जब वह अपने दोस्तों के साथ थे. गिरफ्तारी के कई घंटों बाद पुलिस ने मुझे इसकी सूचना दी और जीतराई से फोन पर बात कराई."
"बाद में थाने में मेरी उनसे मुलाकात भी हुई. मैं उनकी अचानक गिरफ्तारी से आश्चर्य में हूं. रविवार होने के बावजूद उन्हें मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश कर मेरे सामने ही जेल भेज दिया गया. अब हमें कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ेगी."
जीतराई हांसदा के इस फेसबुक पोस्ट के बाद अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) से जुड़े छात्रों ने ग्रेजुएट कॉलेज फॉर वीमेन की प्रिंसिपल से मिलकर उन्हें निलंबित करने की मांग की थी.
इसके बाद कोल्हान विश्वविद्यालय ने उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया. उसका जवाब देने के बावजूद कॉलेज प्रबंधन ने उनका अनुबंध बढ़ाने से इनकार कर अगस्त-2017 में उन्हें कॉलेज से निकाल दिया.
हालांकि, आदिवासियों के प्रमुख संगठन माझी परगना महाल ने कुलपति को पत्र भेजकर उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं करने की अपील भी की थी लेकिन यूनिवर्सिटी ने यह अपील नहीं मानी.
संगठन की दलील थी कि जीतराई हांसदा ने सिर्फ़ आदिवासी परंपरा की बात लिखी है. इससे किसी समुदाय को क्यों ठेस पहुंचेगी. तब से वह सिर्फ़ रंगकर्म से जुड़े थे और आदिवासी मामलों को लेकर मुखर थे.
एक महीने पहले ही उन्होंने जमशेदपुर के ही कोऑपरेटिव कॉलेज में पढ़ाना शुरू किया था. झारखंड के सोशल एक्टिविस्ट इस गिरफ्तारी को उनके ख़िलाफ़ साज़िश करार दे रहे हैं.
झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा की महासचिव व चर्चित लेखिका वंदना टेटे ने उनकी बिना शर्त रिहाई की मांग की है.
बकौल वंदना, जीतराई हांसदा ने संविधान विरोधी कोई बात नहीं लिखी थी. उन्होंने अपनी संताल संस्कृति के अनुसार ही फ़ेसबुक पोस्ट किया था. इसके लिए उनकी गिरफ्तारी उचित नहीं है.

Thursday, January 17, 2019

ما هي المنتخبات الأوفر حظا في التأهل لنهائيات كأس أمم آسيا؟

فاز منتخب السوكيروز بأول لقب آسيوي له في عام 2015 عندما تفوق في النهائي على منتخب كوريا الجنوبية بعد الوقت الإضافي، في سيدني. وكان المنتخب الأسترالي يلعب ضمن اتحاد أوقيانوسيا، لكنه انضم إلى الاتحاد الآسيوي عام 2006، ومنذ ذلك التاريخ لم يغب عن نهائيات كأس العالم.
لكن نجم المنتخب الأسترالي أفل في السنوات الأخيرة، فقد تأهل إلى نهائيات كأس العالم 2018 في روسيا عن طريق مباراة الملحق، وخرج في الدور الأول دون أن يحقق أي فوز، وسجل هدفين فقط في ثلاث مباريات.
ولابد أن المدرب الجديد، غراهام أرنولد، يشعر بالفراغ الذي تركه هداف الفريق المعتزل، تيم كيهيل، ويدرك حاجته إلى هداف يعزز حظوظ السوكيروز في الاحتفاظ بالكأس الآسيوية.
يحتل المنتخب الإيراني أفضل مركز آسيوي في التصنيف العالمي للاتحاد الدولي لكرة القدم (فيفا). وقد أثبت جدارته بهذا الترتيب في نهائيات كأس العالم الأخيرة في روسيا، إذ خسر بهدف لصفر أمام منتخب إسبانيا وتعادل بهدف لهدف أمام منتخب البرتغال بقيادة، كريستيانو رونالدو، بعد أن فاز على المغرب بهدف لصفر.
ولكن طموح المنتخب الإيراني في الإمارات لا يقف عند حدود نيل الإعجاب، بل يتعداه إلى محاولة الفوز بالكأس الآسوية، التي أفلتت منه منذ 1976. وتمكن مدرب ريال مدريد السابق، كارلوس كويروس، من إعداد مجموعة متماسكة من اللاعبين، جعلت منتخب إيران ينهي تصفيات كأس العالم دون هزيمة، ويتأهل بسهولة إلى نهائيات كأس أمم آسيا.
وأقصي المنتخب الإيراني في الدورة السابقة بضربات الترجيح أمام المنتخب العراقي في ربع النهائي، وسيلتقي الفريقان هذه المرة أيضا في مباريات المجموعة الرابعة يوم 16 يناير/كانون الثاني.
يلعب المنتخب الياباني هذه الدورة وهو يسعى إلى الفوز باللقب الآسيوي الخامس. ولم يذق الساموراي الأزرق طعم الهزيمة في 5 مباريات متتالية، منذ أن تولى المدرب الجديد، هاجيمي مورياسو، قيادة المنتخب بدلا من أكيرا نيشونو، الذي قاد اليابان إلى الدور الثاني من نهائيات كأس العالم في روسيا.
ويعول المدرب الياباني على لاعب فريق رد بول سالسبورغ، تاكومي مينامينو، لصناعة اللعب في غياب شينجي كاغاوا، وعلى تجربة مدافع ساوثامبتون، مايا يوشيدا، ولاعب غالاتسراي، يوتو ناغاتومو في قيادة اليابان إلى التتويج الآسيوي.
وتأتي اليابان في المركز الثاني آسيويا بعد إيران، والخمسين عالميا حسب تصنيف فيفا، وعليه فإن أي نتيجة يخرج بها المنتخب من نهائيات كأس أمم آسيا دون نصف النهائي ستعد فشلا للفريق في نظر جماهيره.
يسعى المنتخب السعودي إلى استعادة أمجاد التسعينيات عندما كان ضمن كبار الكرة الآسوية. فقد فاز بالكأس في أعوام 1984، و1988، و1996، وخسر النهائي في أعوام 2000 و2007. وكان أداء السعودية مخيبا في نهائيات كأس العالم 2018 في روسيا، إذ انهزم أمام البلد المضيف بنتيجة 5 أهداف مقابل صفر، في المباراة الافتتاحية، وتتابعت نتائجه السيئة بعدها.
ويقود المنتخب الأخضر في الإمارات المدرب الأرجنتيني، خوان أنطونيو بيتزي، وهو المدرب الرابع للمنتخب منذ 2015. وسيلعب المباراة الأولى أمام كوريا الشمالية تحت ضغط كبير، لأن فريقه لم يفز إلا مرة واحدة في ست مباريات، منذ نهائيات كأس العالم.
يضم منتخب كوريا الجنوبية بين صفوفه أحسن لاعب آسيوي حاليا، وهو مهاجم توتنهام، سون هيونغ مين، الذي يمكن أن يقود منتخب بلاده إلى التتويج بالكأس الآسيوية في الإمارات.
أظهر منتخب كوريا الجنوبية إمكانياته الكبيرة ومهارات لاعبيه العالية عندما فاجأ المنتخب الألماني، بطل العالم، وفاز عليه في نهائيات روسيا 2018. وكاد أن يفوز بكأس أمم آسيا 2015 أمام أستراليا.
وسيغيب سون عن منتخب بلاده في المبارتين الأوليين أمام الفلبين وقيرغستان، بسبب ارتباطاته مع فريق توتنهام في الدوري الانجليزي. ولكن الفريق لا تنقصه المهارات الفنية مثل لاعب نيوكاسل سونغ يونغ، وحارس المرمى، جو هيوون وو، الذي أبدع في المباراة التي فاز بها الكوريون أمام ألمانيا بهدفين لصفر. ولابد أن يكون منتخب كوريا الجنوبية قد ضمن التأهل إلى الدور الثاني، قبل التحاق هداف توتنهام بزملائه في المغامرة الآسيوية.

Tuesday, January 1, 2019

هل تنهي التحركات الديبلوماسية في سوريا عزلتها عربيا؟

ربط العديد من المعلقين في صحف عربية التحركات الديبلوماسية العربية نحو دمشق بالإعلان الأمريكي بخصوص الانسحاب من سورياً.
وينظر لهذه الخطوة على أنها تهدف لملء الفراغ الأمريكي وإعادة سوريا إلى الحاضنة العربية.
يشير شهاب المكاحله في "رأي اليوم" اللندنية إلى أن هناك "مزاجاً عاماً بين الدول العربية مع تحفُظ البعض منها لإعادة سوريا إلى جامعة الدول العربية في عام 2019 تمهيداً لدعوة الرئيس السوري بشار الأسد لحضور القمة العربية التي ستعقد في 31 مارس/آذار 2019 في تونس بعد تجميد عضوية سوريا في الجامعة منذ 2011".
ويقول خليل حسين في "الخليج" الإماراتية على أهمية الخطوة الإماراتية بإعادة فتح سفارتها في دمشق، حيث يدعوا لأن "تُتبع بخطوات عربية أخرى في السياق نفسه، علّ وعسى آن يُعاد التضامن العربي إلى ما كان عليه في غابر الزمن".
من جانبه، يقول أمجد آل فخري في "العربي الجديد" اللندنية: "تتدافع الآن قوى إقليمية ودولية لملء الفراغ اﻷمريكي، بعد قرار ترامب الانسحاب من سورية عسكرياً، بينما تتسابق أنظمة خليجية للإمساك بالنظام والاعتذار عن خطيئتهم".
وينتقد الكاتب ما يصفه بـ"تهافت العرب من تونس إلى السودان إلى الإمارات ومصر ولبنان، لإعادة النظام إلى الحاضنة العربية والقرار العربي، وعدم تركه فريسة لأطماع الطامعين، وإبعاد مخاطر التدخّلات في سوريا، وكأن ملء الفراغ الأمريكيّ يكون باحتضان النظام، الذي يحتاج توافقاً عربياً يعملون على تحقيقه".
وأضاف هذه الدول تبحث عن "مبرّرات لتسويغ هرولتهم للخروج بقرار لجامعة العربية العربية بإعادة النظام".
وتقول فاطمة ياسين في "العربي الجديد" اللندنية إن "الإعلان الذي يبدو مبيتاً يشير، في ظاهرة تشبه سقوط حجارة الدومينو، إلى عودة كل دولة عربية إلى سفارتها القديمة في سوريا".
"دمشق انتصرت"
يقول عبدالله العتيبي في "الشرق الأوسط" اللندنية إنه لا توجد "حلول ناجزة للأزمات المعقدة، مثل الأزمة السورية"، مشيراً إلى أن "أسوأ تلك الحلول هو ترك سوريا نهباً للدول الإقليمية غير العربية، وهذا لا يمنع أبداً من وضع شروطٍ مهمة لضمان أفضل النتائج الممكنة.
لكن حسن مرهج يرى في "رأي اليوم" اللندنية أن العرب هم الذين"يعودون إلى حضن دمشق، وليس العكس، فالمنتصر من يفرض شروطه، و دمشق انتصرت".
يقول: "الرئيس الأسد يجني ثمار صبره و صمود جيشه و شعبه، فالإمارات و البحرين باتوا في دمشق و على أبوابها، و هذه الخطوات ستكون افتتاحية للعديد من الخطوات العربية نحو سوريا".
ولا يتفق حسن مرهج مع ما يصفه بـ حجج واهية" يطلقها العائدون إلى دمشق بأن خطواتهم تأتي في سياق مواجهة النفوذ الإيراني في سوريا، ففي رأيه "أن الواضح أن دمشق ستكون سبيلاً لهم للتقارب أكثر مع إيران، والابتعاد رويدا رويدا عن الغول الأمريكي".
يقول صالح القلاب في "الرأي" الأردنية: "المفترض أن يدرك العرب المتحمسون للدخول على معادلة الأزمة السورية... أن القطار قد فاتهم وأن النظام السوري ليس بمقدرته فتح الأبواب لهم إلا مواربة وليكونوا مجرد ديكورا لا أكثر".
ويرى الكاتب أن إيران لا يمكن أن تسمح لأي دور عربي فعلي في سوريا، لا كدول منفردة ولا من خلال جامعة الدول العربية.
ويقول ياسر عبدالعزيز في "المصري اليوم":سيتم تأهيل نظام بشار الأسد، على حساب أى فرصة لمشروع سياسى معارض يرفع شعارات دولة مدنية ديمقراطية حديثة، وسيتعمق فقدان سوريا لقرارها الوطنى، فى ظل تكالب الروس والإيرانيين والأتراك على خطف إرادة الدولة، وتسييرها وفقاً لمشروعات الدول الثلاث، وستحاول بعض الدول العربية الحفاظ على فرصة لصيانة النذر اليسير من مصالحها فى هذا البلد المخطوف، بفرص نجاح محدودة وضئيلة".
"عودة تدريجية"
يقول أمين بن مسعود في "العرب" اللندنية إنه "لا يمكن فصل تفاصيل هبوط أول طائرة سورية منذ 8 سنوات على الأقلّ، على مطار مدني تونسي (المنستير الدولي)، عن مشهديّة إقليمية كبرى قوامها العودة التدريجية للدفء في جسم العلاقات العربية السورية، وإمكانية استعادة دمشق لموقعها ودورها ضمن الجامعة العربية".
ويرى أن هناك "حسابات وإكراهات، حالت وتحول دون استئناف العلاقات الثنائية، أما الحسابات فهي مرتبطة بالمشهد العربي وهو في طريقه إلى التسوية".
ويضيف "في الوقت الذي تحزم فيه عواصم كبرى خياراتها لصالح دمشق، تخطو تونس 'أنصاف خطوات' تجاه دمشق، فالتمثيل الدبلوماسي في دمشق مقتصر فقط على الجانب القنصلي، وقرار استئناف العلاقات رحلته الخارجية التونسية إلى الأمانة العامة للجامعة العربية، لتبقي على حالة 'نصف الاعتراف' التي تلخص رمادية كافة مواقفها من المشهد السوري.
وتتساءل "هسبريس" الإلكترونية المغربية: "هل يجدد المغرب اعترافه بنظام بشار الأسد بعد الإمارات والبحرين؟"
وتقول إن "موسمُ العودة إلى دمشق قد بدأ" حيث بادرَت دول عربية إلى اقتراحِ وإرسالِ وفود دبلوماسية لملء الفراغ مع إعلان اللإنسحابِ الأمريكي من الأراضي السورية وذلك "عقبَ خمس سنوات من الجفاء والقطيعة الدبلوماسيتين"
وتشير الصحيفة إلى أن هناك تساؤلات عما "إذا كان المغرب سيقدم على خطوة مُشابهة".