सब इंस्पेक्टर अनिल कुमार सिंह की जांच रिपोर्ट के मुताबिक़, जीतराई
हांसदा ने अपने फ़ेसबुक पोस्ट में लिखा था, "हम आदिवासी बीफ़ यानी गौमांस
खाते हैं. जाहेर डांगरी विधान (अंतिम संस्कार के रिच्युअल्स) के समय इसका
वध करते हैं."
"इसके अलावा पर्व-त्योहार में भी काटते हैं. तो क्या
भारत के क़ानून की वजह से हम अपना खान-पान, रिच्युअल्स यानी पारंपरिक
अनुष्ठान बंद कर दें और हिंदू बनकर रहें. आदिवासियत को ख़त्म कर दें. ये
कभी नहीं हो सकता.... अगर सही मायने में आदिवासियों को भारत का हिस्सा मानते हों तो आदिवासियों के भी हितों की रक्षा करते हुए ऐसे क़ानून बनाना
बंद करो..."
हालांकि अब यह पोस्ट जीतराई हांसदा के फ़ेसबुक पेज पर नहीं दिखती. उनकी
पत्नी माही सोरेन ने बताया कि संभव है कि उन्होंने यह पोस्ट बाद में हटा ली
हो.
माही सोरेन ने बीबीसी से कहा, "हम लोग समझ रहे थे कि अब यह मामला बंद हो चुका है, लेकिन उन्हें तब गिरफ्तार कर लिया, जब वह अपने दोस्तों के साथ थे. गिरफ्तारी के कई घंटों बाद पुलिस ने मुझे इसकी सूचना दी
और जीतराई से फोन पर बात कराई."
"बाद में थाने में मेरी उनसे मुलाकात भी हुई. मैं उनकी अचानक गिरफ्तारी से आश्चर्य में हूं. रविवार होने
के बावजूद उन्हें मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश कर मेरे सामने ही जेल भेज दिया गया. अब हमें कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ेगी."
जीतराई हांसदा के इस फेसबुक पोस्ट के बाद अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद
(एबीवीपी) से जुड़े छात्रों ने ग्रेजुएट कॉलेज फॉर वीमेन की प्रिंसिपल से मिलकर उन्हें निलंबित करने की मांग की थी.
इसके बाद कोल्हान
विश्वविद्यालय ने उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया. उसका जवाब देने के
बावजूद कॉलेज प्रबंधन ने उनका अनुबंध बढ़ाने से इनकार कर अगस्त-2017 में
उन्हें कॉलेज से निकाल दिया.
हालांकि, आदिवासियों के प्रमुख संगठन
माझी परगना महाल ने कुलपति को पत्र भेजकर उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं करने
की अपील भी की थी लेकिन यूनिवर्सिटी ने यह अपील नहीं मानी.
संगठन की दलील थी कि जीतराई हांसदा ने सिर्फ़ आदिवासी परंपरा की बात लिखी है. इससे
किसी समुदाय को क्यों ठेस पहुंचेगी. तब से वह सिर्फ़ रंगकर्म से जुड़े थे और आदिवासी मामलों को लेकर मुखर थे.
एक महीने पहले ही उन्होंने जमशेदपुर के ही कोऑपरेटिव कॉलेज में पढ़ाना शुरू किया था. झारखंड के सोशल एक्टिविस्ट इस गिरफ्तारी को उनके ख़िलाफ़ साज़िश करार दे रहे हैं.
झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा की महासचिव व चर्चित लेखिका वंदना टेटे ने उनकी बिना शर्त रिहाई की मांग की है.
बकौल
वंदना, जीतराई हांसदा ने संविधान विरोधी कोई बात नहीं लिखी थी. उन्होंने
अपनी संताल संस्कृति के अनुसार ही फ़ेसबुक पोस्ट किया था. इसके लिए उनकी
गिरफ्तारी उचित नहीं है.